हिन्दी उपन्यास को नया धरातल देता कुबेर

बी.एल. आच्छा

डॉ. हंसा दीप का उपन्यास कुबेर कुछ मायनों में विशिष्ट है। एक फ्लैश बैक, जो ग्रामीण अंचल की टपरी से निकलकर न्यूयॉर्क की झिलमिलाती ज़िंदगी तक ले जाता है। यह गरीबी में घर से भागे, ढाबे पर बर्तन माँजने वाले बालक की न्यूयॉर्क की कुबेर कंपनियों के मालिकाना वैभव तक ले जाता है। पर इन दो अलहदा छोरों को मिलाने वाला तार है, सेवा के मिशन का। इस मिशन की बीजविहीन जमीन है ग्रामीण टपरी में भूख से विचलित माँ का कथन – “कुबेर का खजाना नहीं है मेरे पास जो हर वक्त पैसे मांगते रहते हो।” और इस तपते मरुथल-सी भूख की जमीन से धन्नू का भागना, गुप्ता जी के ढाबे में रोटी के लिये बर्तन माँजने से लेकर ‘जीवन-ज्योत’ के मिशनरी दादा के माध्यम से न्यूयॉर्क तक पहुँचना। धरती यह भी, धरती वह भी; जीवन यह भी, जीवन वह भी। धरती और जीवन के इन दोनों छोरों के बीच की गहरी फाँक एक अंतहीन खाई है जिसे पाटने का मिशन ही गरीब माँ के कुबेर से न्यूयॉर्क के मल्टी कुबेर की जीवन यात्रा को उपन्यास बना देता है।

इस उपन्यास के कथाचक्र में जितनी वास्तविकताएँ हैं, उतने ही धन्नू के धनंजय प्रसाद और डीपी बन जाने के संयोग भी। अलग बात है कि ये संयोग दैवीय नहीं, उपन्यास के प्राणतत्व से जुड़े हुए हैं जिसमें गरीबी को दूर करने का अनथक मिशन ही कारणभूत बना है, जीवन-ज्योत के दादा के अंतरंग दर्शन-मिशन-सेवा से विदेशों में भी अपनी जमीन तैयार करता हुआ। संयोग तो गुप्ताजी जैसे उदार व्यवसायी से संतान-सा सुख प्राप्त करना, जीवन ज्योत के दादा की अस्वस्थता में न्यूयॉर्क तक साथ जाना और उनके प्राणांत के बाद छोटे दादा के रूप में उत्तरदायित्व का अनुयायियों के साथ निर्वाह। यों इन सुखद संयोगों के बीच का दुखांत भी गहरे घाववाला है। धन्नू का माता-पिता के लिये वेतन के पैसे से खरीदे हुए कपड़े ले जाना मृत्यु की पीड़ा का समाचार ही बन जाता है। और जीवन-ज्योत की सेवा के दौरान दांपत्य की डोर से बंधनेवाली नैन का एक्सीडेंट में मर जाना। इन गहरे घावों के साथ दादा का एकाएक चले जाना भी आघातक ही रहा। पर लेखिका ने इन गहरे घावों के बीच ग्रामीण जमीन पर मैरी को बहन के रूप में सिरजा है और न्यूयॉर्क में जॉन भाई के साथ सारे उतार चढ़ावों में मिशनरी साथी के रूप में। इसीलिए संयोग-दुर्योग-संयोग के उतार-चढ़ावों में इस उपन्यास की कथा कई मोड़ों के साथ कभी रुकती हुई भी सहज ही बहने लगती है। यों भी मिशनरी जीवन-नदी बिना घाटियों-मोड़ों के कहाँ बह पाती है पर ये ही उतार-चढ़ाव इस उपन्यास में पठनीय प्रवाह बना देते हैं। एक दूरतर जमीन तक फैली इस औपन्यासिक कथा में दुनिया का अंधेरा भी है और गगनचुंबी इमारतों की रोशन दुनिया भी। पर इन दोनों दुनियाओं के अंतर में एक अंत:सूत्र समाया है और वह है झिलमिलाती दुनिया में धन कमाकर अंधेरी जमीन को उजाले में बदलने का। और यह आकस्मिक नहीं है कि विवेकानंद ने भी शिकागो सम्मेलन के बाद भाषणों से डॉलर कमाकर भारत में भेजने का संकल्प डेढ़ सौ साल पहले लिया और आज की भारत की पीढ़ी भी उस मिशन से इन अंधेरी-उजली दुनियाओं को मानवीय पक्ष से जोड़ रही है।

भूख और माँ-बापू की मृत्यु का अन्तस्ताप जरा-सी पुरवाई के बहते ही कितना मूल्यपरक बनकर दिशा बदल देता है और मानवीय सहकार की भावभूमि को पूरी जिंदगी में उगा देता है। और यहीं से वह उदात्त मूल्य भी विकसित होता है जो मैरी, जोसेफ, धीरम, ताई सुखमनी और जीवन-ज्योत के ग्यारह बच्चों को अपना परिवार बना लेता है देश में भी, विदेश में भी। लेकिन इस उपन्यास की खूबी उसकी प्रवासी आँख में है जिसके सरोकार और मनोविज्ञान दोहरे हैं – “प्रवासियों की आत्मा भारत के अपने गाँव-शहर में अपनी बिछुड़ी यादों को खोजती रहती है और शरीर यहाँ अपने लिये नयी जमीन तलाश कर रहा होता है। ऐसा कटु सत्य था यह जो विदेश में बसे हर नागरिक को अपनी कटी जड़ों के लिये संघर्षरत ही पाता था।” लेखिका की प्रवासी आँख के बहाने हिन्दी उपन्यास को नया धरातल मिला है, आँगन के पार जाकर उस दुनिया के विकास की रंगत, नये जीवन मूल्य, नये संघर्ष, निरंतर नयी जद्दोजहद, बाज़ार की ताकत, बाज़ार में जगह बनाने के लिये टीम-पैसा-कंपनी-लोग और लिंक। और इसी में तकनीक और ह्यूमन टच की द्वंदात्मकता किसी अर्थ को तलाशती है। सच है कि तकनीक ने स्वर्ग रचा है पर “इस तकनीक के पीछे आदमी की दिमागी मैराथन की ही जीत है, समूची मानवता के बारे में सोचिए कितना बेहतर हुआ है जनजीवन।” इसीलिए जॉन भाई के साथ सहकार का एक बिंदु यदि ग्रामीण अंचल के जीवन-ज्योत से मानवीय स्तर पर पोषक बना है तो दूसरा अमेरिकी बाजार में अपने अस्तित्व और कामयाबी से नये कीर्तिमान रचता तकनीक की सीढ़ी से गुजरता डीपी सर का दिमाग। धन्नू, धनंजयप्रसाद, डीपी और डीपी सर। माँ का कुबेर का भूख से तड़पता उलाहना और अमेरिकी जमीन पर कुबेर का खजाना गढ़ती धन्नू से डीपी सर की आकाश की ऊँचाई। धन्नू से डीपी सर बना यह पात्र कभी नहीं भूलता कि “पेट की भूख के सामने हर भूख छोटी लगती है।” यही बात इस उपन्यास को दो जमीनों को, दो सभ्यताओं को, बाजार की गलाकाट स्पर्धाओं और मानवीय स्पर्शों को, गरीबी और अमीरी के स्तरों को किसी आंतरिक पीड़ा, कुछ बड़े संकल्प और तकनीक पर टिके निरंतर विकसित होते बाजार में अपनी जद्दोजहद को एकतान किये रहती है। यह बनावट यदि कथास्तर पर है तो बुनावट में पूर्व और पश्चिम की दुनिया का सोच भी इस उपन्यास को दृष्टिपरक बनाता है।

इस उपन्यास के उत्तरार्ध में अमेरिकी जीवन और बाजार सभ्यता के कितने ही दृश्य उभरे हैं, पर इनके भीतर सारे उतार-चढ़ावों के बीच रिश्तों का संसार और तकनीक की निरंतर अनथक दौड़ का मनोविज्ञान भी जगह पाता रहा है। इसीलिए आंतरिक स्पर्श, दार्शनिक मूल्य, निरंतर बदलते जीवन के साथ बदलाव का मनोविज्ञान, तकनीकी ज्ञान की ताकत, निरंतर चुनौतियाँ, एक बड़ा-सा कैनवास, टीम संस्कृति का बाजार वर्चस्व, भौतिक सुखों में भी मानवीय सरोकारों का सोच जैसे कई पक्ष व्यक्ति और समाज के स्तर पर खूब उतरे हैं। मसलन कसिनो का जुआ संसार भी अपनी हदों को पहचानता है। लोगों के आत्मनियंत्रण और बस्तियों के कल्याण की वांछा से पुष्ट है – “हर अमीर आदमी जब यहाँ आता है तो एक राशि तय करके आता है……। उस बजट के अंदर ही वह रहेगा। इसके बाद जीता तो जीता, हारा तो हारा।” लेकिन कसिनो का सामाजिक सरोकार भी है – “कसिनो से प्राप्त राजस्व को यहाँ के ‘नेटिव अमेरिकन्स’ यानि ‘एबओरिजिनल्स’ के उत्थान के लिये लगाया जाता है। लास वेगस के आसपास के कई रिज़र्व हैं जो कसिनो के राजस्व के हकदार हैं।” और इसे महाभारत के ‘जुआघर’ के समानान्तर रखकर कहा गया है – “ये किसी महाभारत को रचते या किसी द्रौपदी को दाँव पर लगाते नहीं थे बल्कि मन की पैसों की भूख मिटाने के लिये थे। ये शकुनि कभी नहीं कहलाते पर इतिहास को बदलने का माद्दा रखते। इनकी हर हाल में जीत ही होती। इनमें कोई शकुनि किसी को फँसाता नहीं ना ही कोई धर्मराज युधिष्ठिर इसमें फँसते चले जाते।” दरअसल आनंद और हर दिन को उत्सव मानकर जीने का यह सोच इस झिलमिल विकास का मनोविज्ञान है।

ऐसा भी नहीं कि इस रंगीन धरती का उत्सवी मनोविज्ञान आहत नहीं है। निरंतर दौड़, बाजार लक्ष्यों की प्रतिस्पर्धा, तकनीक के निरंतर विकास से पुराने औजारों को पीछे छोड़ पैसा कूटने की मानसिकता के साथ इस झिलमिलाती सभ्यता का अंधेरा पास्कल साहब के पारिवारिक जीवन की नियति में देखा जा सकता है – “दो बार शादी, दोनों बार तलाक, कड़वे तलाक, आरोपों-प्रत्यारोपों वाले तलाक। आर्थिक सेटलमेंट कमर तोड़ कर रख देते हैं। मासिक खर्च के साथ संपत्ति चली जाती है। संपत्ति ही नहीं मन की अच्छाइयाँ भी उसके साथ चली गयी थीं।” और इसके विपरीत ध्रुव पर डीपी का परिवार। खून का रिश्ता नहीं फिर भी धीरम, ताई, जॉन, मैरी और परिवार जीवन-ज्योत के बच्चे। लेखिका ने इन समांतर कथाविन्यासों के दो ध्रुवों के साथ उनके परिदृश्यों के परिणामी मनोविज्ञान की तहों का भी स्पर्श किया है।

यों तो दुनिया के इन दोनों छोरों और सभ्यता के ध्रुवों के परिदृश्य ठीक से अंतर्ग्रंथित हैं जो कथाविन्यास को संक्रमित करते रहते हैं पर इनके भीतर तमाम संघर्षों के बीच जीवन की सच्चाइयाँ आंतरिक स्पर्श पाकर तरल-सी मूल्यवत्ता बन जाती हैं। कभी दार्शनिक फलसफे में, कभी सूक्ति के सोच में, कभी जीवन के मूल्यपरक अंदाज में, कभी समय के साथ आदमी के बदलाव की प्रकृति में, कभी रिश्तों की अनजानी दृष्टि में, कभी औरों की पीड़ा सहेजने में। कभी किसी संकल्प को अनासक्त होकर आनंद के साथ जीने में और कभी बाजार की सारी स्पर्धाओं के बीच इस सत्य को पाने में भी – “कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, ना ही किसी काम को करने से कोई आदमी छोटा होता है, बल्कि वह उदाहरण पेश करता है दुनिया के सामने अपनी मेहनत का अपनी खुद्दारी का।” भारतीय जाति व्यवस्था और श्रेष्ठता को चुनौती देती पश्चिम के बाजार की यह सच्चाई अन्य बातों के बावजूद मनुष्यता और उसकी जीवट को सूत्र बनाती है। पूरे उपन्यास में बाजार सभ्यता की बीज शब्दावली, बाजार संस्कृति और उसकी हार-जीत की उखाड़-पछाड़ के अंदाज हिन्दी उपन्यास के कैनवास को बड़ा भी बनाते हैं और समानान्तरता में पाठकीय सोच के धरातल को नये सोच से संक्रमित भी करते हैं। परन्तु दादा और डीपी के भाषणों की जितनी प्रशंसा और उनके प्रभावों की सफलता के जश्नों का नरेटिव इस उपन्यास की दार्शनिक या वैचारिक संपदा की शब्दावली में नहीं उतर पाया है। अलबत्ता कहीं-कहीं संवादों में उनकी मूल प्रेरणा की झलक मिल जाती है पर उद्बोधन एवं उद्बोधन शैली की झलक नहीं मिलती। अलबत्ता जीवन-ज्योत का क्रियापरक, सेवापरक मानवीय सोच न्यूयॉर्क की जमीन पर मानवीय सरोकार को तकनीक के माध्यम से साधने की जद्दोजहद तक ले जाता है – “क्या हम दिव्यांग लोगों के लिये ऐसे प्रोग्राम तैयार कर सकते हैं जिसमें एक दृष्टिहीन अपने हाथ में उस यंत्र को लेकर अपने दिमाग में सब देख सके, एक बधिर उसके माध्यम से सब कुछ सुन सके और एक मूक उसके द्वारा बात करके निर्देश दे सके।” निश्चय ही यह दो सभ्यताओं की सोच को अपनी पूरक साध्यता में प्रस्तुत करता निरपेक्ष सोच है, बेहतर मानवता के लिए।

‘कुबेर’ का युवा होता धीरम, धनंजय उर्फ डीपी के मूल्यबोध और तकनीकी विकास को अगला सोपान देते हुए मानवीय प्रगति के नवोन्मेषी सिलसिले को अनथक अंदाज देता है। यहाँ डीपी सर का अध्याय साँसें गिनता है पर इन्ही टूटती साँसों के बीच धीरम के भाषण पर बजती तालियाँ इस नवोन्मेषी मानवीय सोच को नया प्रतिमान देती है – “यहाँ एक नहीं, कई कुबेर खड़े हैं।” सरल सी प्रवाही भाषा, उलझावहीन कथानक, देश-विदेश की सभ्यता-संस्कृति के अंत:संक्रमित परिदृश्य, बाजार सभ्यता का अंतरंग और घटनाचक्र से फूटता तरल सोच निश्चय ही इस उपन्यास को पठनीय बनाते हैं। प्रवासी आँख में बसा भारत औऱ अमेरिकी जीवन से जुड़ता जीवन उस अनुभव को उतार लाता है जो नरेटिव नहीं अनुभवपरक है और लेखिका का सधा हुआ अनुभव धाराप्रवाह होकर तरल स्पर्शों से भरा-पूरा है।

लेखक वरिष्ठ आलोचक हैं।

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