‘बंद मुट्ठी’ भावनाओं का जीवंत दस्तावेज़

डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह

डॉ. हंसा दीप का प्रथम उपन्‍यास ‘बंद मु्ठ्ठी’ सिंगापुर एवं कनाडा के घटनाक्रमों पर आधारित डायरी एवं संस्‍मरण दोनों विधाओं का सम्मिश्रण कहा जा सकता है। अधिकांश उपन्‍यास अतीत की स्‍मृतियों में ही चलता रहता है और धीरे–धीरे जीवन के विभिन्‍न पक्षों को उजागर करता चलता है। मेरे विचार से इस उपन्‍यास का प्रमुख आधार है जीवन की छोटी-छोटी खुशियां और मानव जीवन से जुड़ी व्‍यक्ति विशेष की परंपराएं। आज मानव बहुत ही अनिश्चितता का जीवन जीता है प्रत्‍येक क्षण आने वाले पल के प्रति शंकालू रहना प्रवृत्ति सा बन गया है। इसका प्रमुख कारण है हमारा हम से ही जुदा हो जाना। हम होते तो हैं परंतु हमारा सारा अस्तित्‍व दूसरों पर आधारित रहता है। हम अपनी सोच के प्रति स्‍वतंत्र नहीं रह गये हैं। बचपन से माता-पिता के सोचे अनुसार चलना, फिर नाते रिश्‍तेदार, मित्रों, मुहल्‍लेवाले, समाज आदि का ख्‍याल रखते-रखते व्‍यक्ति खो सा जाता है। उसे क्‍या चाहिए, वो किसमें खुशी का अहसास कर सकता है, अधिकांशत: दबा दिया जाता है। इसी प्रकार के छोटे–छोटे परंतु जीवनोपयोगी महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न इस सम्‍पूर्ण उपन्‍यास में शिद्दत से अनुगुंजित होते रहते हैं।

किसी भी रचना की पठनीयता ही उसकी लोकप्रियता का आधार होती है। बंद मुठ्ठी पठनीयता की दृष्टि से एक उत्‍तम कृति है क्‍योंकि भावात्‍मक पृष्‍ठभूमि पर आधारित होने के कारण जब पाठक एक बार पात्रों के साथ जुड़ जाता है तो वह पात्रों का होकर रह जाता है और पात्र उसके हो जाते हैं। पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ये हमारे किसी अपने की जीवनी है या इसमें हम भी कहीं न कहीं हैं। आज विभिन्‍न व्‍यस्‍तताओं के कारण हम स्‍वयं से ही खो गए हैं। उपन्‍यास के पात्र जगह–जगह पर झांक कर हमसे हमको ही मिलाते हुए से प्रतीत होते हैं। तान्‍या और सैम तथा रिया में हम कहीं न कहीं स्‍वयं को या अपने परिवार के किसी न किसी सदस्‍य को पाते हैं।

उपन्‍यास का प्रारंभ द्वंदात्‍मक परिवेश में होता है। माता-पिता का सामान्‍य परिवेश में भी आज संतान के समक्ष सत्‍य प्रकट करना मुश्किल सा हो गया है, ऐसे में जब संतान को बचपन में गोद लिया गया हो और उसे एक पौधे की भांति सींच-सींच कर बड़ा किया गया हो तब उसके दूर होने का अहसास पुन: माता-पिता को सोलह-सत्रह वर्ष पूर्व पहुंचा देता है जहां खुशियां तो हैं परंतु नि:संतान होने का दर्द भी है। ऐसा दर्द जिसका उपचार एक संतान ही हो सकती है। स्‍वयं की कोख से संतान को जन्‍म दे पाने की पीड़ा एक स्‍त्री ही समझ सकती है। तान्या के जीवन के परिवर्तन की रूपरेखा उसके अध्‍ययन काल से बनती है। तान्या को उपन्यास की नायिका के रूप में यहीं से उभारा गया है। उपन्यास का ताना-बाना बहुत ही सुगठित रूप से ऐसा बुना गया है कि राजी दी और पापा-मम्मी से प्रारंभ होकर जो कथा अग्रसर होती है वह सहजता के साथ तान्या के जीवन में पाठक को लाकर खड़ा कर देती है। यहाँ से कथा धीरे-धीरे एक धीर गंभीर नदी में परिवर्तित हो अंत में सुख के सागर में विलीन हो जाती है। हंसा जी ने इस भाव को बहुत ही सिद्धहस्‍तता के साथ उपन्‍यास में प्रस्‍तुत किया है। माता-पिता दोनों ने यह निश्चित किया हुआ होता है कि वे जब उनकी गोद ली हुई पुत्री सोलह वर्ष की हो जाएगी तब वे उसके जन्‍मदिन के अवसर पर उसे बता देंगे कि वे उसके जन्‍मदाता माता-पिता नहीं, पालक माता-पिता हैं। सत्‍यनिष्‍ठा, मातृत्‍व, संतान सुख एवं उसके जुदा होने का आभास एक माता को किस हद तक आशंकित कर सकता है ये हमें उपन्‍यास का ये अंश दर्शाता है – ‘‘दिल के रिश्‍ते जीते, ना जीते, पर पिछले सोलह सालों में जो खुशी तान्‍या को मिली है, उसके तो अब कोई छीन नहीं सकता। इन बीते सालों ने एक पूर्णता दी है उसे। ‘मां’ न बन पाने का एक अधूरापन ख़तम किया है, जो उसकी पूंजी है अब। एक ऐसी धरोहर है, जो सदा ही तान्‍या की रहेगी। देने वाले ने उसे इतना दे दिया है कि अब कुछ न भी दे, तो उन यादों के सहारे ही जी लेगी तान्‍या। जिंदगी कट जाएगी उसकी, उन यादों को याद करते हुए।’’

प्रस्‍तुत उपन्यास का कथानक अपने साथ वैशिष्‍ट्यपूर्ण है। कथानक की पृष्ठभूमि में सिंगापुर और टोरंटो (कनाडा) तथा अल्‍पतम रूप में पोलैंड व चीन हैं। बहु-देशीय पृष्ठभूमि वाले इस कथानक में पात्रों में भारत एवं हिंदी भाषा दोनों ही जीवंत हैं, भले ही परिवेश अलग है। अमेरिका और कनाडा में सपरिवार जीवन का लंबा समय व्‍यतीत कर चुकी डॉ. हंसा दीप के कथाकार मन में भारत, भारतीयता, संस्‍कृति तथा हिंदी भाषा के प्रति जुड़ाव कथानक को सरल और हृदयस्पर्शी शब्द-चयन के साथ बहुत ही सहजता के साथ बढ़ाते हुए उपन्‍यास को पूर्णता प्रदान करती हैं। शब्‍द चयन, आयु और वातावरण के अनुसार चित्रों को प्रदान करते हैं। प्रस्‍तुत उपन्‍यास के अग्रलिखित उदाहरण लेखिका के भारत और यहां की संस्‍कृति से असीम जुड़ाव को प्रदर्शित करते हैं – “बीज तो बचपन में ही बोए जाते हैं, तभी तो फसल कटती है…, फल मिलता है….” पापा के अंदर का दूरदर्शी पिता दार्शनिक बनने लगता।’’ ये वक्‍तव्‍य हर भारतीय पिता को व्‍याख्‍यायित करता है। जिस प्रकार एक किसान फसल को बोने के पूर्व खेत में मेहनत करता है उसी प्रकार पिता संतान रूपी बीज को आरोपित करता है, उसे सींचता है, उसके सुख दुख का ख्‍याल रखता है और जब संतान उसी इच्‍छा अनुसार चलने के बजाय अपनी मर्जी से चलती है तब पिता को भी किसान की भांति पीड़ा होती है। लेखिका द्वारा उपन्‍यास में इस उदाहरण को दिया जाना उनके भारत भूमि से जुड़ाव को स्‍पष्‍ट दर्शाता है।

किसी अपनेके बगैर कितना बदल जाता है इंसान का जीवन! मम्मी और दीदी के पल्लू को पकड़ कर पली-बढ़ी लड़की आज एक नए देश में कितनी अकेली हो गयी है।’’ पुत्री का विवाह किसी भी परिवार के लिए बहुत बड़ी घटना होती है। जिस पुत्री को बड़े लाढ़ प्‍यार से पाला-पोसा होता है वह हमेशा के लिए उनके आंगन को छोड़कर जाती है। भारत से बाहर जाकर जब कोई परिवार विदेश में रहने लगता है तो पाश्चात्य संस्कृति में रहते हुए भी उसके भीतर वर्षों से पैठे हुए पारंपरिक संस्कार, कई सारी वर्जनाओं की स्‍थापना उस परिवार के सदस्‍यों के मन में कर देते हैं। मूल संस्कारों से अलग हटकर नई पीढ़ी जब अपने किसी निर्णय पर आगे बढ़ जाती है तो माँ-बाप के भीतर बैठा संस्कारी स्वभाव उस परंपरा से हटकर लिए गए निर्णय को स्वीकार नहीं कर पाता है। यहीं द्वंद उपन्‍यास में एक प्रमुख भावना के रूप में चित्रित हुआ है।

दो पीढ़ियों में सोच का अंतर – घर में बड़े बच्चे होने का सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि सारी तमन्नाएं पूरी करने के लिए उसी बच्चे को केन्द्र बना लिया जाता है।’’ हंसा दीप के उपन्‍यास के इस कथन से किसी भी परिवार का दृश्‍य उपस्थित हो उठता है। माता–पिता एवं अन्‍य परिवारीजन बड़े बच्‍चे से भावनात्‍मक स्‍तर पर बहुत ज्‍यादा जुड़े होते हैं। इस विश्‍व में संभवत: बिरला ही हो जिसकी सभी इच्‍छाएं, आशाएं एवं तमन्‍नाएं पूरी हो पाई हों। ऐसे में माता-पिता जो स्‍वयं नहीं कर पाए या जो उन्‍हें नहीं मिल पाया वह अपनी बड़ी संतान को देने के लिए दिन रात एक कर देते हैं और चूंकि वे पूरी ईमानदारी के साथ उस बच्‍चे की परवरिश करते हैं इसलिए उससे अपेक्षाएं भी सर्वाधिक होती हैं। ऐसे में यदि बड़ी संतान अपनी इच्‍छा से निर्णय ले ले, विशेषकर शादी विवाह का तो माता-पिता के असंख्‍य सपने चूर-चूर हो जाते हैं। यद्यपि इसमें माता पिता का कोई स्‍वार्थ नहीं होता है। यहां सिर्फ प्रेम होता है, संतान की बेहतरी की भावना होती है। एक शिल्‍पी के रूप में संतान का जीवन गढ़ने वाले पिता का मन इस बात से आशंकित रहता है कि कहीं उसकी संतान के निर्णय से उसका जीवन तबाह न हो जाए, वह दुखों के भंवर में न फंस जाए। चूंकि सारा मामला दो पीढ़ियों के मध्‍य सोच के अंतर का होता है, यहां अक्‍सर युवा पीढ़ी और पालक पीढ़ी की सोच एवं मान्‍यताओं में टकराव देखा जाता है।

अमीरों की दुनिया में एक होड़-सी हो जाती है कि कौन, अपने बच्चों की शादी कितने ठाठ से करेगा! यहीं पर सारे पैसे वाले अपने पैसों को इस तरह उड़ाते हैं कि लगता है, आने वाले मेहमानों को अपनी रईसी का प्रदर्शन कर रहे हों। पैसों के बलबूते पर साख टिकी होने का जीता-जागता उदाहरण है, ये शादियाँ।’’ सर्वविदित है कि दुनिया प्रदर्शन की है। समाज में अपनी श्रेष्‍ठता दर्शाना मानव की प्राचीनत वृत्ति है और इसी वृत्ति का परिणाम होता है शादी-ब्‍याहों में आवश्‍यकता से अधिक धन का व्‍यय। खर्च करने वाला सम्‍पन्‍न होता है परंतु वह यह भूल जाता है कि यदि वह उसी धन को किफायत से खर्च करे और बचे हुए धन को समाज, कल्‍याण या देशहित में लगाए तो सम्‍पूर्ण मानव समाज का भला हो सकता है परंतु अधिकांशत: धनवानों की सोच बहुत ही संकीर्ण पाई जाती रही है। इसी संकीर्णता का परिणाम है देश में सामाजिक असंतुलन।

दाम्‍पत्‍य जीवन और प्रेम तान्या के जीवन में सैम का प्रवेश होता है। धीरे-धीरे सैम और तान्या के मध्य प्रेम पनपता है और विवाह संबंध में बंधने के साथ दोनों के प्रेम को लेखिका ने सम्‍पूर्ण विस्तार प्रदान करते हुए उसे सहज ग्राह्यता की स्थिति तक पहुंचाया है। पोलैंडवासी सैम और सिंगापुरवासी तान्या साथ में जीवन जीने का तय कर लेते हैं और एक दूसरे का हाथ थामे हुए मुश्किल झणों में भी अपनी प्रेम भावना को कम नहीं होने देते हैं। नायक और नायिका के जीवन में आने वाले परिवर्तनों का लेखिका ने बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण करते हुए भावनात्‍मक चित्रण किया है। संभवत: ऐसा बिरला ही परिवार हो जहां परिवारजनों में आपस में किसी बात पर नोंक झोंक न होती हो, तर्क वितर्क न होता हो। छोटी-छोटी नोंक झोंक को लेखिका भी दांपत्‍य जीवन में सदस्‍यों का परस्‍पर लगाव एवं प्रेम का मूलाधार मानती हैं क्‍योंकि जहां अपनापन नहीं, लगाव नहीं वहां कोई कुछ भी करे किसी भी सदस्‍य को कोई फर्क नहीं पड़ता। बतौर उपन्‍यास ‘‘जिस दिन झगड़ना बंद होगा, शायद हम एक-दूसरे से दूर होने लग जाएँगे।” इस तथ्‍य का प्रमाण है कि हम जिससे प्रेम करते हैं और उसी से अपेक्षाएं भी रखते हैं।

बंदी मुठ्ठी उपन्यास के सभी पात्र अपने आप में बहुत सत्‍यनिष्‍ठ हैं,  सभी को एक-दूसरे का ख्‍याल होता है परवाह होती है, एक दूसरे से पारस्परिक स्नेह और लगाव सम्‍पूर्ण उपन्‍यास में स्पष्ट परिलक्षित होता है। संबंधों की  प्रगाढ़ता और परस्‍पर अप्रस्‍तुत परंतु आवश्‍यक अपेक्षाओं के मध्‍य नायिका तान्‍या के ‘स्व’  की जीवन-यात्रा के भावपूर्ण खट्टे-मीठे अनुभव ह्रदयस्‍पर्शी हैं। पति का पत्‍नी के लिए, पत्‍नी का पति तथा संतान का माता-पिता के प्रति तथा दीदी एवं मौसी के प्रति जुड़ाव सम्‍पूर्ण पात्रों को एक दूसरे से अटूट रिश्‍ते से बांधे रखता है। नायिका का बचपन से ही अधिकांश कार्यों के लिए अपनी दीदी पर निर्भर रहना वस्‍तुत: अकर्मण्‍यता का नहीं लगाव का बोधक है। ‘‘मासी तो माँ-सी होती है।’’ वाक्‍य वर्तमान बिखरते पारिवारिक रिश्‍तों के परिदृश्‍य में बहुत ही सार्थक लगता है। प्रवासी जीवन में भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं के मध्‍य पात्रों का परस्‍पर रिश्तों के प्रति उत्तरदायित्‍व का बोध कहीं न कहीं लेखिका के प्रवासी मन में विद्यमान भारतीयता का परिचय देता है। अपनी पुत्री के लिए सभी अवसरों को जुटाने, पुत्री को सभी प्रकार से आत्मनिर्भर बनने का पाठ पढ़ाने वाले स्नेहिल माता-पिता का अहं तब बुरी तरह से आहत होता है जब वह तान्‍या का स्‍वेच्‍छा से विवाह का निर्णय सुनते हैं, और नायिका का यह निर्णय रिश्तों की मिठास में अनचाहे ही एक कसैलापन घोल देता है। दो पीढ़ियों की सोच का पार्थक्‍य पाठक घर-घर की कहानी का बोध कराते हुए पाठकों के मन से सीधा संवाद स्थापित करने में सक्षम है। लेखिका का उद्देश्‍य यहां बहुत ही स्‍पष्‍ट है कि वर्तमान परिदृश्‍य में संकुचित होते रिश्‍तों के मध्‍य तथा दो पीढि़यों की विचारधारा की टकराहटपूर्ण स्थिति को माता-पिता की पारंपरिक सोच को विस्तार देकर भविष्‍य अच्‍छे हेतु रिश्तों के नवीन क्षितिज का सहज अन्‍वेषण संभव है। वस्‍तुत: उपन्‍यास का मूल उद्देश्‍य भी यही है।

भाषा एवं शैली की दृष्टि से संस्मरणात्‍मकता के साथ उपन्यास कहीं-कहीं पर आत्मकथात्मक भी प्रतीत होता है। सरल एवं सुसंवादयुक्‍त शैली कहीं भी पाठ की गत्‍यात्‍मकता में बाधा उत्‍पन्‍न नहीं करती है। संवाद छोटे-छोटे हैं और शब्‍द चयन भावानुकूल होने के‍ साथ-साथ अर्थग्राह्यी हैं। प्रत्येक पात्र को उसकी पूरी संभावनाओं के साथ खोजकर प्रस्तुत किया गया है। साथ ही पात्रों के अनुकूल भावों का पूर्ण निर्धारण करते हुए देश, काल और स्थितियों के अनुरूप प्रस्‍तुतिकरण उपन्‍यास को विशिष्‍टता के साथ-साथ भावात्‍मक क्रमबद्धता भी प्रदान करता है। मानव जीवन के मूल्‍यों का सत्‍यता और रूढ़ियों के मध्‍य से सुगम मार्ग का नैसर्गिक रूप से अन्‍वेषण रोचकता के साथ-साथ कथानक को विश्वसनीय एवं प्रामाणिकता स्थापित करता है। सम्‍पूर्ण उपन्‍यास में भाषाई क्लिष्‍टता न आने देना लेखिका के कुशल शब्‍द शिल्‍पी होने का प्रमाण है। हंसा जी का लेखकीय कौशल इस कला के माध्‍यम से भी स्‍पष्‍ट होता है कि लेखिका उपन्‍यास में प्रत्‍यक्ष रूप से अनुपस्थित हैं फिर भी वे उपन्‍यास के हर कोने में उपस्थित सी आभासित होती हैं।

उपन्यास “बंद मुट्ठी” पूर्ण जागरुक लेखकीय दस्‍तावेज होने के साथ-साथ भावनात्मकता का एक ऐसा संसार है, जिसमें एक पूरा परिवार अपने पूरेपन के साथ हँसी, खुशी तथा सुख-दु:ख के साथ पाठक के समक्ष अपनी विद्यमानता दर्ज कराता है। लेखिका की यह प्रथम औपन्‍यासिक कृति है परंतु कहीं भी इसमें अपरिपक्‍ता नहीं है और न ही इसमें कहीं पठनीयता और भाषा की सजगता के स्तर पर कमता परिलक्षित होती है। सहज प्रवाहमयी कहानी के प्राकृतिक बहाव में पाठक बहता चला जाता है और उपन्‍यास के अंत में सकारात्‍मकता के साथ अपनी मंजिल पर पहुंचता है।

लेखक राजकीय मॉडल डिग्री कॉलेज, अरनियां खुर्जा, बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) में सहायक आचार्य (हिंदी) हैं।

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