कथा सृजन भी करती है और संघर्ष भी – डॉ. हंसा दीप

कथाकार, लेखिका हंसा दीप से सत्यवीर सिंह की बातचीत

मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके में जन्मी और देश में दस वर्ष तदुपरांत अमेरिका तथा कनाड़ा के उच्च शिक्षा संस्थानों में हिंदी अध्यापन करवाने वाली बहुचर्चित कथाकार हंसा दीप का जीवन एक खट्टी मिट्ठी यादों का सागर है। हंसा दीप का जीवन और लेखन अनुशासन की चटशाल है। कथा लेखन के सूत्र, संस्कार तथा हिंदी की वैश्विक स्थिति और भविष्य पर डॉ. हंसा दीप से डॉ. सत्यवीर सिंह की सारगर्भित बातचीत

सत्यवीर सिंहः नमस्कार जी। आपके नाम के रहस्य तथा आपके जीवन सफ़र का संक्षिप्त परिचय जानना चाहेंगे।

हंसा दीप: नमस्कार डॉ. सत्यवीर जी। आपका पहला प्रश्न ही राज़ खोलने को आतुर दिखाई दे रहा है। हंसा दीप हमेशा सबके लिये उत्सुकता पैदा करता है कि मैं असल में हूँ कहाँ से। मेरे छात्र, मेरे मित्र कई कयास लगाते हैं इस बारे में। जैन समाज के लोग सोचते हैं कि मैं जैन नहीं हूँ। मैंने अंतर्जातीय विवाह किया है। दीप शब्द की वजह से कई लोग मुझसे पंजाबी में बात करना शुरू कर देते हैं। गुजराती भाषी समझते हैं कि हंसा नाम गुजराती है इसलिये मैं गुजराती हूँ। सभी को जवाब देने के बजाय मैं सिर्फ मुस्कुरा देती हूँ।

असल में बात बहुत छोटी-सी है, वह यह कि शादी के बाद मुझे जातिगत सरनेम रखना अच्छा नहीं लगा। उन दिनों लेखकों में उपनाम लगाने की परंपरा का चलन था। दीप शब्द मुझे बहुत पसंद था तो नया नाम रखने की चाहत में मैंने इसे अपने सरनेम की तरह लगाना शुरू किया। धीरे-धीरे यही नाम ऐकेडमिक रिकॉर्ड में आ गया और तब से अब तक दीप मेरे नाम का हिस्सा है। हालाँकि यह बात अलग है कि मेरे परिचय में कभी जैन शब्द न आने के बावजूद मुझे मिसेज जैन ही कहा जाता है जो शायद पुरुष प्रधान समाज का प्रतीक है। लेकिन परिहास करते हुए मुझे यह कहना अच्छा लगता है कि “मैं मिसेज़ जैन नहीं हूँ।”

भारत, मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के ग्राम मेघनगर में मेरा जन्म हुआ। यह एक आदिवासी बहुल इलाका है। गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमारेखा पर बसा हुआ है। प्रारंभिक शिक्षा मेघनगर एवं स्नातक व स्नातकोत्तर उच्च शिक्षा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से हुई। विक्रम विश्वविद्यालय से पीएच.डी. प्राप्त करने के पहले ही मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में बतौर सहायक प्राध्यापक के रूप में मेरी नियुक्ति हो चुकी थी। लगभग ग्यारह वर्षों तक स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में हिन्दी का अध्यापन करने के बाद न्यूयॉर्क शहर की कुछ संस्थाओं में और उसके बाद टोरंटो, कैनेडा में यॉर्क यूनिवर्सिटी में हिन्दी अध्यापन किया। तदन्तर पिछले सोलह वर्षों से यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में हिन्दी पढ़ा रही हूँ।

सत्यवीर सिंहः मध्यप्रदेश में दस वर्ष अध्यापन करने बाद विदेश गमन कैसे? इस सफ़र की कहानी और आपकी जुबानी

हंसा दीप: अब क्या बताऊँ आपको सत्यवीर जी, मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्य करते हुए मैं अपने जीवन का श्रेष्ठ समय व्यतीत कर रही थी कि धर्म जी (मेरे पति धर्मपाल महेंद्र जैन) का न्यूयॉर्क तबादला हुआ। परिवार साथ-साथ रहे इसलिये अपना काम-धाम छोड़कर विदेश के लिये रवाना होना पड़ा। तब परिवार सहित इस यात्रा की योजना सिर्फ तीन वर्ष के लिये थी और वापस जाकर कार्यभार संभालना था। शायद नियति की योजना कुछ और थी। तब से देश छोड़ा तो वापसी नहीं हुई। रिश्तेदारों से मिलने जाते रहे और लौट कर आते रहे। नये देश में, नयी शुरुआत करनी पड़ी। लगभग छह से सात साल तक न्यूयॉर्कवासी और बाद में टोरंटोवासी हो गए। मध्यप्रदेश के विदिशा, राजगढ़, ब्यावरा व धार महाविद्यालयों में, स्नातक व स्नातकोत्तर कक्षाओं में हिन्दी का अध्यापन करने के बाद विदेश में मेरा पहला पड़ाव अमेरिका था। महाविद्यालयों में शिक्षण का वह समय मुझे बेहद आत्मविश्वास और साहस दे गया था। शायद यही वजह थी कि तब से अब तक मैंने हिन्दी का हाथ थामे रखा। इसीलिये स्वदेश से दूर होने का ज्यादा गम न रहा मुझे। न्यूयॉर्क शहर ने मुझे चुनौतियों के साथ अपनापन दिया। वह प्यार मेरे दिल में कुछ इस तरह अंकित है कि इस शहर का नाम सुनते ही मुझे पहली बार विदेश में कदम रखने की अनुभूति आज भी वैसे ही होती है जैसे तब हुई थी।

सत्यवीर सिंहः आपने उच्च शिक्षा प्राप्त की है। उस समय महिलाओं के लिए यह रास्ता कंटीला होता था, इस मार्ग के कुछ अनुभव?

हंसा दीप: जी, बिल्कुल सच कहा आपने। उस समय कहें या इस समय, महिलाओं के रास्ते कँटीले ही होते हैं। तब भी महिलाओं ने साहस के साथ काँटों को फूल बनाया और आज भी बना रही हैं। गुरुवर रवींद्रनाथ टैगोर की विश्वप्रसिद्ध कविता “एकला चालो रे” मेरा साहस बढ़ाती रही है। आज से साठ वर्ष पूर्व मेघनगर जैसे छोटे-से गाँव में कुछ भी नहीं था। लेकिन “जहाँ चाह वहाँ राह” तो बन ही जाती है। मेरे घर में व्यावसायिक माहौल था साथ ही पढ़ाई का माहौल भी। मेरी रुचि देखते हुए बड़े भाई ने मेरी पढ़ाई जारी रखने के समुचित प्रयास किए। परिवार बना, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, आगे कुछ न कुछ करते रहने की उत्कंठा भी बढ़ती गयी। घर में पढ़ाई का, किताबों का माहौल मिलना मेरे लिये वरदान साबित हुआ।

सत्यवीर सिंहः कनाडा की धरा से वसुंधरा कैसी दिखती है?

हंसा दीप: राकेश शर्मा जी जब अंतरिक्ष में गए थे तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने पूछा था कि– “वहाँ से भारत कैसा दिखाई दे रहा है।” तब राकेश शर्मा ने कहा था – “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।” मैं भी इसी भावना को, इसी प्यार को आज भी मन में बसाए हूँ। अपने जीवन के लगभग चालीस वर्ष स्वदेश में बिताए हैं उसके बाद विदेश गमन हुआ। शायद यही वजह है कि अपनी धरती से दूर होकर हम उसे और याद करते हैं। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” वाली भावना मेरी पीढ़ी तक तो बहुत गहरी है लेकिन आगे आने वाली पीढ़ियों तक रहेगी या नहीं इस बारे में आशंकाएँ बनी रहती हैं।

सत्यवीर सिंहः लेखन, नौकरी और परिवार के त्रिकोण में संतुलन कैसे बनता है?

हंसा दीप: सबसे पहले परिवार फिर नौकरी और आखिरी में लेखन। यह क्रम व संतुलन बनाना नहीं पड़ता है यह तो बना बनाया खाका है। अगर पहले दो बिन्दु ठीक हैं तो ही तीसरे को जगह मिल सकती है। मैं सोचती हूँ मेरी तरह हर कामकाजी महिला के जेहन में यही क्रम होता है। कई प्राथमिकताओं के बाद लेखन के लिये जब समय मिलता है तो वह निरा अपना होता है। वह मन के आराम का समय होता है, जब रोजमर्रा के जीवन से निकाले गए फुरसत के क्षणों का भरपूर लुत्फ उठा लिया जाए। तब कलम वह कह पाती है जो मन को बहुत अच्छा लगता है एवं वह भी जो मन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। फिर वह चाहे जो आकार ले ले, मन को ऊर्जा देता है। यह रचनात्मक प्रयास तभी संभव हो पाता है जब त्रिकोण की दोनों भुजाएँ परिवार और नौकरी मजबूत खड़ी रहें, तीसरी भुजा तभी अपना श्रेष्ठ दे पाती है।

सत्यवीर सिंहः आपके जीवन का वह वाकया, जिसने आपको लेखन की तरफ़ प्रेरित किया?

हंसा दीप: आदिवासी बहुल क्षेत्र में जन्म लेकर पली-बढ़ी मैं, बचपन से ही आसपास के माहौल से आंदोलित होती रही। एक ओर शोषण, भूख और गरीबी से त्रस्त भील थे तो दूसरी ओर परंपराओं से जूझते, विवशताओं से लड़ते और एक ओढ़ी हुई जिंदगी जीते मध्यमवर्गीय परिवार थे। मालवा की मिट्टी और मेघनगर का पानी संवेदित लेखनी को सींचते रहे। मुझे बचपन से किताबें पढ़ने का बहुत शौक रहा। आज से पचपन-साठ साल पहले किताबें ही तो मनोरंजन का एकमात्र साधन हुआ करती थीं। शायद यही वजह थी कि मेरी लिखने-पढ़ने में रुचि बनी रही। शिक्षण संस्थानों में लेखन से जुड़ी सारी प्रतियोगिताएँ मुझे कई पुरस्कार दिलवाती रहीं। शायद बीजारोपण वहीं से हुआ था। हालांकि ठौर-ठिकाने बदलते रहे, एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश में घर बसाती गयी मैं। देशों का बदलता परिवेश कथ्यों को विविधता देता रहा और रचनाओं को आकार मिलता रहा।

सत्यवीर सिंहः आपके शिक्षक, मित्र या अन्य; जिनका आपके जीवन में अविस्मरणीय योगदान रहा। उनके नाम तथा योगदान?

हंसा दीप: शिक्षण संस्थाओं में मेरे सभी शिक्षक मुझे बेहद आत्मीयता देते थे। मेरे हिन्दी के शिक्षक डॉ. शोभनाथ पाठक व डॉ. दीक्षित न केवल मुझे आगे की पढ़ाई के लिये उत्साहित करते थे बल्कि मेरे बड़े भाई से भी इस बारे में बात करते थे। छोटी उम्र में ही पिताजी की मृत्यु होने से भाई महेश भंडारी ने मेरी पढ़ाई को बहुत बढ़ावा दिया। वरना आज भी मेरे साथ स्कूल गयी हुई लड़कियाँ बस उतना ही पढ़ पायीं। हम गाँव से जरूर थे लेकिन पढ़ाई-लिखाई से सदा जुड़े रहे। अनाज की दुकान पर काम करते हुए, भाई की मदद करते हुए अपनी पढ़ाई को जारी रखा। समय को खींच कर मुट्ठी में लाने की कोशिश करके सपने देखने की आदत रही है और एक बार सपने देखने की आदत हो जाए तो उन सपनों को पूरा करने के लिये प्रयास करते रहने की आदत पड़ ही जाती है।

सत्यवीर सिंहः आपके कृतित्व की संक्षिप्त रूपरेखा तथा उल्लेखनीय कार्य…

हंसा दीप: भारत में स्नातकोत्तर डिग्री पाने के बाद महाविद्यालयीन शिक्षा में अध्यापन से जुड़ना मेरे जीवन का अहम भाग रहा। स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को पढ़ाने की चुनौतियों ने मेरी क्षमताओं को निखारा। छोटे बच्चों के साथ परिवार की जिम्मेदारी, सामाजिक बंदिशें, मारवाड़ी बहू का पल्लू सिर पर रखकर कॉलेज पढ़ाने जाना, ये सारी बातें मुझे रोक नहीं पायीं। मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण का अनुभव लेकर भारत से न्यूयॉर्क आना एक बहुत बड़ा बदलाव था, जिसने मुझे पूरी तरह बदल दिया। अपने पिछले सुनहरे शैक्षणिक कैरियर को ताक मे रखते हुए फिर से घर पर छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। न्यूयॉर्क के हिन्दू सेंटर में हिन्दी कक्षाएँ शुरू कीं। एम.ए. की कक्षाओं को पढ़ाने के बाद अहिन्दी भाषी बच्चों को अ, आ, इ, ई वर्णमाला सिखाना मेरे लिये कहीं से कहीं तक निराशाजनक नहीं रहा। वक्त की दरकार थी यह, बीती जिंदगी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। न्यूयॉर्क शहर में थोड़ा जमने लगी थी कि परिस्थितियाँ फिर से बदलीं और हम टोरंटो आ गए। मेरी ए, बी, सी, डी पूरी भी नहीं हो पाती थी और देश बदल जाते थे। तब से अब तक यूनिवर्सिटी ऑफ टोंरंटो में हिन्दी अध्यापन कर रही हूँ। अब तक तीन कहानी संग्रह- चश्मे अपने-अपनेप्रवास में आसपासशत प्रतिशत तथा दो उपन्यास बंद मुट्ठी व कुबेर प्रकाशित हुए हैं। बिगिनर्स व इंटरमीडिएट कक्षाओं के लिये बनाए गए कोर्स पैक शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी किताबें हैं। इस समय भारत व भारत से बाहर की सभी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन हो रहा है। मैंने कई अंग्रेज़ी फिल्मों के अनुवाद भी किए हैं। इस कार्य को करते हुए भाषा विशेष की अभिव्यक्तियों को अन्य भाषा में लाने की चुनौतियों से सामना हुआ

सत्यवीर सिंहः आपके लेखन के प्रेरणा स्रोत तथा सृजन की भूमिका …

हंसा दीप: मैंने बहुत किताबें पढ़ी हैं व आज भी पढ़ती हूँ। हमेशा से लगता रहा कि मुझे कहानी और उपन्यास पढ़ना अच्छा लगता है व परीक्षाओं में भी कविताओं पर लिखने के बजाय कहानियों पर लिखना भाता था। शायद यहीं पता लग गया था कि गद्य में मेरी रुचि अधिक है। पूरे जीवन में कुल जमा तीन छोटी-छोटी कविताएँ लिखी हैं। भारत में रहते हुए आकाशवाणी के लिये कई नाटक लिखे। तकरीबन तीस नाटक आकाशवाणी इंदौर व भोपाल से प्रसारित हुए, कई कहानियाँ प्रसारित एवं प्रकाशित हुईं। उन दिनों सोशल मीडिया के नाम पर सिर्फ पोस्टकार्ड भेजे जाते थे। ऐसे ही पोस्टकार्ड आते थे प्रशंसा के साथ। वही मेरा प्रेरणा स्रोत रहा। बस इसी तरह ताना-बाना बुनने की आदत को प्रोत्साहन मिला। मन के भीतर चलते द्वंद कागज पर उतरने को बेताब हो जाते हैं तो रचना आकार लेती है।

सत्यवीर सिंहः मूलतः कथा लेखन आपकी प्रिय विधा है। कथा सृजन करती हैं या संघर्ष?

हंसा दीप: कथा संघर्ष से शुरू होती है, विसंगतियों का पर्दाफाश करती है व रचनात्मकता के साथ अंत होता है। सकारात्मक अंत देना मेरी पूरी कोशिश होती है मगर इक्का-दुक्का रचनाओं में ऐसा नहीं हो पाता। कुछ तो पात्रों की जिद, कुछ परिवेश की व कुछ कथ्य की। यह कहानी के पात्रों के ऊपर भी निर्भर करता है कि वे मुझे कितना उकसाते हैं और उन्हें अपनी बात कहने की कितनी जल्दी है। संघर्ष जीवन का एक हिस्सा है। स्वाभाविक ही कथा उससे प्रभावित होती है। क्योंकि कथाकार अपने आसपास जो देखता है वही लिखता है। उसमें उसकी अनुभूति शामिल होकर उसे नया रूप दे देती है। इसलिये कथा सृजन भी करती है और संघर्ष भी। इसके लिये मैं अपनी एक कहानी शत प्रतिशत का उदाहरण देना चाहती हूँ। बाल शोषण से जुड़ी इस कहानी में मुख्य पात्र जीवन के तीस वर्ष बदले की भावना में जीता है। जिस दिन उसे यह बदला लेना है उस दिन की एक घटना से उसका हृदय परिवर्तित हो जाता है। सालों तक अपराध करने की भावना के बाद उसका अंत रचनात्मक हुआ। उस अंत से नि:संदेह पाठक को सकून देने की भावना बलवती रही। सृजन व संघर्ष कथा के मुख्य तंतु चाहे न हों लेकिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में उपस्थित तो होते ही हैं। कथा, आकार लेने से पहले कई रूप लेती है। योजना तो होती है मस्तिष्क में, पर कहानी के पात्र योजनानुसार नहीं चलते। कई बार इतने जिद्दी हो जाते हैं कि एक जगह अटक जाते हैं तो आगे ही नहीं बढ़ते। मैं सोचती हूँ कि हर रचनाकार के साथ ऐसा होता होगा चाहे वह चित्रकार हो, शिल्पकार हो, या फिर शब्दकार।

सत्यवीर सिंहः कथा जीवन संग्राम की अभिव्यक्ति है। कथन से सहमत हैं?

डॉ.हंसा दीपः लेखन साहित्य का अंग है व साहित्य समाज का दर्पण। लेखक की कलम एक हथियार की तरह चलती है, समाज की विद्रूपता को सामने लाती है, उसकी विसंगतियों पर प्रहार करती है व सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। तब उसे सत्ता की क्रूरता को भी सामने लाना होता है और वहीं लेखक समाज का दिशा निर्देश करता है। उसे उस मार्ग पर चलने को बाध्य कर देता है जहाँ से वह अन्याय के खिलाफ लड़ सके। यहीं आकर साहित्य, लेखक व कलम समाज का स्वरूप बदलने में अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं। आम लेखक की कलम किसी विचारधारा, वाद या देशों की सीमा के घेरे में बंधकर नहीं चलती। वह अपने आसपास जो देखती है, वही लिखती है। अंतर सिर्फ इतना होता है कि वह सीधी-सादी रिपोर्टिंग न करके उसमें लेखक की अपनी सोच, अपनी कल्पना को जगह देकर उसे रचनात्मकता का जामा पहना देती है। समालोचक, समय या परिस्थितियाँ उसे चाहे कोई भी नाम दें, लेकिन इससे उसकी रचनात्मकता पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

निश्चित रूप से हर कला इंसान के मानसिक रूप को नये आयाम देकर सोच की सारी बंद खिड़कियों को खोल देने की ताकत रखती है। फर्क सिर्फ इतना-सा है कि कहीं तूलिका होती है, कहीं छैनी-हथोड़ी होती है तो कहीं कलम होती है। लेखनकला में कवि अपनी कविताओं में बह जाता है तो कथाकार अपने पात्रों के साथ जीने लगता है। अपनी मुश्किलों को, अपने दर्दों को किसी और के जरिए प्रस्तुत करता है। अपनी टूटी हिम्मत को जब अपने पात्रों द्वारा जोड़ने की कोशिश करता है तो स्वाभाविक ही वह अपनी हिम्मत को संगठित कर रहा होता है। लेखन, लेखक की नकारात्मक सोच को सकारात्मकता से जोड़कर उसके अपने जीवन को बेहतर बनाने में अत्यधिक मदद करता है। कथा जीवन के आसपास बहती है सतत, वह जीवन ही क्या जहाँ संग्राम न हो। कथाकार उसमें अपनी दृष्टि सम्मिलित करके उसे अपनी कृति जरूर बनाता है लेकिन कह जाता है समाज की सच्चाइयों को, खुद पर बीती बातों को। कथा के पात्र असल दुनिया से आते हैं जो कहानी के साथ-साथ, लेखक के साथ भी कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। उन पात्रों को लेखक अपने भीतर जीने की आजादी देकर अपनी रचना को पूर्णता देता है। जब मैं बंद मुट्ठी उपन्यास लिख रही थी तब इसके मुख्य पात्र तान्या और सैम सोते-जागते हर कहीं दिखाई देते थे मुझे। वे पूरी तरह से मेरे अंदर रच-बस गए थे। बहुत कुछ बाहरी दुनिया का होने के बावजूद लेखक की अपनी सोच का मुलम्मा तो कथ्य पर चढ़ता ही है। समाज की सोच, समाज की विसंगतियाँ और समाज के संगठन-विघटन के तार्किक पहलुओं के साथ लेखक की अपनी अनुभूतियाँ उजागर होती हैं।

सत्यवीर सिंहः आज साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर हैं ? इसके जिम्मेदार कौन हैं, कौनसी शक्तियों का हाथ है?

हंसा दीप: जी सच कहा आपने, भारत हो या भारत के बाहर, हर ओर एक सवाल है कि हिन्दी के पाठक कहाँ, हिन्दी की पुस्तकों की बिक्री क्यों नहीं, हिन्दी पुस्तकें छपें तो पढ़ेगा कौन, आदि आदि। भारत में यदि ये सारे सवाल परेशान कर सकते हैं तो हम जैसे विदेशों में बसे हिन्दी प्रेमियों की स्थिति का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। अगर हम यह कहें कि किताबें पढ़ी नहीं जातीं तो इसका एक कारण यह भी है कि इन दिनों साहित्य का मतलब और उसकी पहुँच कई अलग-अलग आकारों में परिवर्तित हो गयी है। अन्य रूपों में साहित्य हमारे सामने होता है और हम उसे बहुत पसंद करते हैं। एक जमाना था जब सिर्फ पुस्तकें ही मनोरंजन का साधन होती थीं लेकिन आज वैसा नहीं है। टीवी सीरियल, फिल्में, ये सभी उत्कृष्ट लेखन के बलबूते पर चल रहे हैं। कई फिल्मी गीत हैं जो कविता की उत्कृष्टता को चरम तक पहुँचा देते हैं। कला फिल्में हमारे दिल में अपनी जगह बना लेती है, वह भी एक कहानी ही है और साहित्य का एक हिस्सा है। इतने टीवी चैनल, इतने समाचार चैनल, इतने वीडियो, ऑडियो, सोशलमीडिया हर जगह इतना पढ़ लेता है इंसान कि उसे किताबों की जरूरत महसूस नहीं होती। वक्त के साथ अब ऑडियो बुक्स आ रही हैं। वीडियो आ रहे हैं। इसलिये कई विकल्पों के चलते पुस्तकीय आकार को उतना महत्व नहीं मिल पाता।

सत्यवीर सिंहः वैश्विक स्तर पर हिन्दी की स्थिति, गति एवं भविष्य पर आपके विचार…

हंसा दीप: हम सब जानते हैं कि आने वाली पीढ़ियों में हिन्दी का भविष्य बहुत सुरक्षित नजर नहीं आता। वैश्विक स्तर पर हिन्दी को जीवित रखने में भारतीय फिल्म उद्योग का योगदान महत्वपूर्ण है। हालाँकि कई समर्पित लोग अपने हिन्दी प्रेम के कारण हिन्दी पढ़ा रहे हैं, लिख रहे हैं, पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं। लेकिन आने वाली पीढ़ियाँ अंग्रेजी की भक्त हैं, या यूँ कहें कि यह उनकी जरूरत है। भारत में भी युवा पीढ़ी हिन्दी से दूर हो रही है। सोशल मीडिया पर रोमन लिपि में लिखे हिन्दी के संदेशों की भरमार होती है। तब सवाल उठता है कि हिन्दी जानने वाले भी हिन्दी लिखने से क्यों कतराते हैं, क्यों डरते हैं हिन्दी लेखन की गलतियों से। भारत में ही कई नगरों-महानगरों में, गली-मोहल्लों में साइनबोर्ड पर हिन्दी तो है पर रोमन लिपि में लिखी हुई। ये छोटी-छोटी बातें हमें ग्लोबल वार्मिंग की तरह चेतावनी तो नहीं देतीं पर हाँ संभल जाने का आह्वान जरूर करती हैं। जीवन की भागमभाग में हमारा ध्यान इस मूक चेतावनी पर नहीं जा रहा है। समय की इस तेज़ दौड़ में हिन्दी भाषा का सरलीकरण चाहिए। भाषा की सरलता ही उसकी जीवंतता को कायम रख सकती है। धीमी गति से हिन्दी के साथ वही हो रहा है जो संस्कृत और लेटिन जैसी अपने जमाने की समृद्ध भाषाओं के साथ हो चुका है। घर हो या घर के बाहर, काम पर या काम से इतर, हिन्दी बोलने-लिखने-सुनने-देखने का एक जुनून-सा सवार हो, हर हिन्दी भाषी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो, तभी तो हम हिन्दी को उसका सही स्थान दे पाएँगे। ये ही वे परिस्थितियाँ हैं जो हिन्दी को निरंतर आगे बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

सत्यवीर सिंहः अपना बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत धन्यवाद। आपसे हमारी यह बातचीत हिंदी पाठकों के लिए बहुपयोगी सिद्ध होगी।

हंसा दीप: आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। आपका हार्दिक आभार एवं शुभकामनाएँ।

सेतु, जून 2020 में प्रकाशित।

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