कुबेर

(उपन्यास ‘कुबेर’ का एक पठनीय अंश)

उनके बच्चे उनकी ताक़त थे। एक से एक ग्यारह, ग्यारह से एक सौ इक्कीस और आगे इस तरह अपना गणित जारी रखना चाहते थे। आर्यभट्ट, आइंस्टीन और न्यूटन की थ्योरी जग जानता है। एक और थ्योरी लिखी जा चुकी है जिसे घर-घर तक पहुँचाना है।

सच पूछा जाए तो कुबेर में छिपा वह अनाथ बच्चा धन्नू हठीला था। अनार के दानों की तरह जुड़ कर बने रहने की कला के साथ रहना चाहता था क्योंकि बिखरे हुए तो मोती भी अपनी सुंदरता को सही पहचान नहीं दे पाते। गुँथे हुए मोती साथ-साथ रहकर क्या कुछ नहीं कर लेते। सुन्दरता का अप्रतिम दृश्य रचित करके आँखों को भरपूर सुकून देते हैं। ख़ून का रिश्ता हो न हो, दिल और दिमाग़ का रिश्ता ऐसा था कि सब एक-दूसरे के लिए थे। घर में भी घर के बाहर भी। अपने पापा के दिमाग़ का सही अनुमान लगाने के लिए वे अधिक से अधिक उनके साथ समय बिताते। उन बच्चों के जवान इरादों की, जवान योजनाओं की प्रतीक्षा थी। 

इन सबके जोश को देखकर एक नया कार्यक्रम बना जिसके तहत हर वह बच्चा जिसके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका था और हर वह बच्चा जो स्पेशल चाइल्ड था, उसे अपनी शरण में लेने का। उन बच्चों को हर तरह की सुविधाएँ दी जाती थीं आत्मनिर्भर बनाने के लिए। जिसे जो करना है करे पर अपनी लगन से करे। हर चार के समूह का एक हेड होता। ऐसे दो समूहों का एक और हेड होता। यूँ हर माह की रिपोर्ट जब कुबेर को दी जाती तो उसमें हर बच्चे की मासिक प्रगति की जानकारी होती। किसी बच्चे को बेचारा नहीं समझा जाता, चाहे वह बच्चा ख़ास ज़रूरतों की श्रेणी में आता हो, तो भी। स्पेशल चाइल्ड के लिए सब कुछ स्पेशल होता। उसके विकास के लिए अतिरिक्त सुविधाएँ दी जातीं और उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के अथक प्रयास किए जाते।

इस मिशन में दूर-दूर से स्पेशल चाइल्ड आते रहे, भर्ती होती रही। उनमें से कई संगीत में अपना नाम आगे बढ़ाते रहे तो कई ने अपनी रुचि के अनुसार चित्रकला, छाया चित्रकला आदि में महारथ हासिल करके एक ऊँचे जज़्बे के साथ काम शुरू किया। हर बच्चे को ख़ूब पढ़ाना, जिसका पढ़ने में मन न हो उसे कोई तो काम चुनना पड़ता था करने के लिए। जो भी काम वह चुनता, उसी में उसे विशेषज्ञता हासिल करनी होती थी। एक बात का ध्यान रखा जाता कि उन्हें किसी भी चीज़ के लिए तरसना न पड़े। 

अपने सफ़र में साथ चलते गाड़ी चला रहे ड्राइवर की बातें सुनते, हँसते-हँसाते, हल्की-फुल्की बातों से मनोरंजन करते। पास्कल साहब को बहुत अच्छा लगता जब वे उनकी छोटी-छोटी ज़रुरतों का ध्यान रखते। चाय-कॉफी के लिए रास्ते में पर्याप्त विराम लेते। बिटिया धरा जो भी कहती, बहुत ध्यान से सुनते चाहे वह लंबी बात होती। बच्चा क्या और बड़ा क्या, कोई भी, कभी भी लाख रुपए की बात कह जाए।

आम जीवन की ख़ास शुरुआत की थी फ़ोन अटेंड करके। एक दिन आया जब स्वयं उनके एक नहीं कई फ़ोन अटेंड करने वाले थे। पूरी की पूरी टीम थी, टीम भी एक नहीं कई टीमें।

पास्कल साहब कहते – “सर, एक फ़ोन तो आप अपने पास रखिए।”

“आज़ाद परिंदे का जीवन जीने दीजिए मुझे पास्कल साहब, मेरे सारे तनाव तो आपने ले लिए हैं।”

“सर, मेरी बेचारी किस्मत को आपसे जुड़कर अपनी यात्रा ख़त्म करनी थी वरना मैं पूरी दुनिया से खफ़ा होकर ही जाता यहाँ से।”

“जाने का नाम मत लीजिए, वरना मेरा क्या होगा मेरी आज़ादी का क्या होगा।”

“मेरा बस चलता तो मैं आपके साथ ही जुड़ा रहता जन्म से लेकर आज तक।” निश्चित ही पास्कल साहब भी उनके ऐसे कई विश्वस्त सहायकों में से एक थे जो सदा के लिए उनसे जुड़ गए थे।

जब भी वे अपने बाहरी दौरों पर नहीं होते तब उन बच्चों के साथ अपना अधिकांश समय बिताते जो स्पेशल चाइल्ड कहे जाते। कई बच्चे ऐसे भी थे जो काम नहीं कर सकते थे। उनके लिए कोई न कोई मदद की ज़रूरत होती इसके लिए वे हमेशा अधिकतम तनख़्वाह पर किसी को नौकरी पर रखते ताकि उन बच्चों की असहाय स्थिति का कोई फ़ायदा न उठा पाए। स्वयं भी वहाँ रहना चाहते ताकि कोई उनकी नासमझी को अपनी कामुकता का सहारा न बना ले।

कई बच्चे बोल नहीं पाते थे, कई चल नहीं पाते थे, कई सुन नहीं पाते थे। उनका आपस में ऐसा जोड़ा बनाने की कोशिश रहती कि कोई मदद न रहने पर वक्त-बेवक्त वे एक दूसरे का सहारा बन जाएँ। एक अंधे और एक लंगड़े की एक दूसरे का मददगार बनने की वह कहानी याद थी जो बचपन से सुनी थी। वे पाठ और वे कहानियाँ अब उनके जीवन का एक हिस्सा थीं जिन पर चलकर उन असहाय बच्चों की मदद की पुरज़ोर कोशिश होती।

ऐसे ही एक बार मिकी जो सुन नहीं सकता था के ऊपर कुछ गिर रहा था। विडंबना की बात यह थी कि उसके ठीक सामने जैसन था जो चल नहीं सकता था। वह कैसे बचा पाता, वह बचाने के लिए जा ही नहीं पाया और देखते-देखते एक हादसा हो गया। ऐसे में सोची-समझी कोई बात काम नहीं आयी क्योंकि उनकी जोड़ी अधूरी थी। इस समस्या से निपटने के लिए एक सप्ताह तक रोज़ एक झूठमूठ का दृश्य रचा गया, जहाँ देखा गया कि कौन किसकी मदद, किस तरह से कर सकता है। इस तरह हर दिन प्रयास करके उनके दोस्त बदले गए और एक दूसरे की मदद के रास्ते खोजे गए। अब वे अपने कई कामों के लिए किसी तीसरे पर निर्भर नहीं रहते। आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास जितने किए जा सकते थे, बस उतने ही दिमाग़ी दौड़ से आकार ले पाए थे।

इस घटना के बाद वे बेहद व्यथित हो गए। अब उन्होंने यहीं इन बच्चों के साथ रहने का मन बना लिया था। अपने शानदार मेंशन से यहाँ बच्चों के साथ रहना किसी परिवर्तन का संकेत था। बच्चों को अपने पिता के इस हठ में किसी नयी योजना का आभास हो रहा था।

“पापा, आप यहाँ रहने के बजाय सारी देखरेख घर से भी कर सकते हैं।”

“हाँ बच्चे, मगर इन दिनों घर तो अधिक रहता नहीं हूँ इसलिए इनके साथ समय बिताने का यही एक मार्ग नज़र आ रहा है मुझे।”

“लेकिन पापा आप दिन भर यहाँ रहकर शाम को घर आ जाइए।”

“नहीं बेटा, मिकी के साथ जो दुर्घटना घटी है, उसके बाद मैं इन बच्चों के साथ रहना चाहता हूँ ताकि उनका विश्वास बना रहे और मेरा भी।”

बच्चे क्या कहते, जानते थे उनका लक्ष्य, उनका काम। अपने नये मिशन को पूरा करने वे वहीं रहने लगे। यद्यपि इन बच्चों के लिए की गयीं ये व्यवस्थाएँ पर्याप्त नहीं थीं वे उनके जीवन को इतना आसान बनाना चाहते थे कि किसी भी स्पेशल चाइल्ड को किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

ऐसा क्या करें कि इन बच्चों की तकलीफ़ें कम हों। अपने इन्हीं विचारों में खोए हुए थे कि पास्कल साहब ने कहा – “सर, धीरम के प्रेज़ेंटेशन का समय हो रहा है हमें चलना होगा।”

वे फिर भी अपने विचारों में खोए थे। “सर, आपकी तबीयत तो ठीक है न?”

“हाँ, हाँ, पास्कल साहब चलिए।”

“सर तबीयत ठीक नहीं हो तो हम वहाँ जाना केंसल कर सकते हैं।”

“तबीयत तो ठीक है पास्कल जी, मगर मैं इन बच्चों के लिए चिंतित हूँ।” 

“जी, मगर क्यों?”

“जो अभी हमने व्यवस्थाएँ की हैं वे पर्याप्त नहीं हैं, फिर से कोई दुर्घटना घट सकती है इसी बात का अंदेशा बना रहता है।”

“तो इनके लिए क्या योजना है सर?”

“दिक्कत तो यही है कि कोई योजना नहीं है, यहाँ आकर मैं अटक जाता हूँ, मेरी सोच भोथरा जाती है।”

पास्कल साहब और वे अपने-अपने रोज़ के इन दौरों में व्यस्त रहते हुए एक दूसरे के साथी हो गए थे। एक सफल और एक असफल व्यक्ति का यह जोड़ा एक दूसरे का पर्याय बनता जा रहा था। उनकी हताशा और निराशा ने अपनी जड़ें काट दी थीं। आशा की हल्की किरण अपना उजाला फैलाते उनके मन को भरपूर रौशनी देने लगी थी। पास्कल साहब समझ ही नहीं पा रहे थे कि – “सर क्यों इतना सोच रहे हैं।”

“सर, काम करने वालों के लिए तो आपने बहुत सारे प्लान बनाए हैं तो इतनी निराशा क्यों?”

“बनाए तो थे पास्कल साहब पर वे सब उनके लिए थे जिनके शरीर के सारे अंग काम करते हैं। जिनके अंग काम नहीं करते उनके बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये अगर काम करेंगे तो इनके रास्तों में आनेवाली रुकावटों से कैसे पार पाएँगे। जीवन के गड्ढों में कैसे संतुलन बना पाएँगे। इनके लिए तो हर रास्ता ऐसा फिसलता रास्ता हो जाता है कि एक बार जहाँ पैर फिसला तो उठ नहीं सकते। उनकी इस फिसलन को ख़त्म करना चाहता हूँ मैं।”

“सर हम पहुँच गए हैं।” सामने गाड़ी पार्क करवाने की व्यवस्था में जुट जाते हैं पास्कल जी।

धीरम की प्रस्तुति है। बड़ी स्क्रीन पर धीरम और उसके प्रोजेक्ट से संबंधित सारी जानकारियाँ एक के बाद एक चल रही हैं। काफी चहल-पहल है। तकरीबन चार सौ से पाँच सौ युवा बुद्धिजीवी हैं। पापा को देखते ही सारे बच्चे उनके इर्द-गिर्द आ कर अपनी सीट ले चुके हैं। धरा ने अपनी शिकायत शुरू कर दी कि – “पापा, आने में इतनी देर क्यों कर दी।”

“अभी तो कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ है बच्चे, देर कहाँ हुई।”

“मैं तो आपका आधे घंटे से इंतज़ार कर रही हूँ।”

“अच्छा बाबा कान पकड़ता हूँ, आगे से ऐसा नहीं होगा।”

और वह अपनी जीत पर मुस्कुरा कर उनके पास बैठ जाती है। सामने बड़े मंच पर धीरम आता है और आँखों से झुककर पापा का आशीर्वाद लेता है। यह एक सरप्राइज़ है पापा के लिए।

“हैलो, एंड वेलकम टू माय स्पेशल प्रेज़ेंटेशन – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। आर्टिफिशियल यानि जो हमें प्रकृति ने नहीं दिया है, प्राकृतिक रूप से प्राप्त नहीं है जिसे हमने यानि मनुष्य ने बनाया है। ऐसी बुद्धि जो कृत्रिम कही जा सकती है जिसमें मनुष्य के मस्तिष्क की भांति सोचने और समझने की क्षमता हो। ठीक वैसे ही जैसे हमने कम्प्यूर को इतना समझदार बना दिया है, ड्रॉन बना दिए हैं, रोबॉट बना दिए हैं, ऐसे ऐप बना दिए हैं जो हर तरह से हमारी मदद करते हैं। बगैर ड्राइवर के चलने वाली गाड़ियाँ बना दी हैं। ऐसी संगणक प्रोग्रामिंग को उन्हीं तर्कों के आधार पर चलाने का प्रयास करते हैं जैसे एक मनुष्य का मस्तिष्क चलता है। हमारे कई प्रयोग कारगर हुए हैं और कई हो रहे हैं। जीपीएस जब चलता है तो एक गलत रास्ता पकड़ने पर तुरंत कहा जाता है कि – “आप यू टर्न लीजिए” और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह मानव के मस्तिष्क से ही बनायी हुई डिवाइस उससे भी बेहतर काम करती है। इस तरह एक नहीं अनेक क्षेत्रों में हमारे मस्तिष्क ने ऐसे कई छोटे-छोटे मस्तिष्क बना दिए हैं जो बटन दबाते ही मदद के लिए तत्पर रहते हैं।”

“अध्ययन चल रहा है। ऑटो पायलट तो थे ही अब ऑटो ड्राइवर भी सड़कों पर होंगे। जब टेस्ट ट्यूब बेबी का पहला कामयाब केस हुआ था तो यह एक विस्मय था। अब संसार में न जाने कितने टेस्ट ट्यूब बेबी हैं जिनकी अपनी संतानें भी इस दुनिया में आ चुकी हैं। जटिल कामों को न्यूनतम समय में करके समय और ऊर्जा की बचत कर रहे हैं हम।” वह बोलता रहा और सभा सुनती रही।

कुबेर के मन में एक सवाल था, वही सवाल जो दिन भर से कचोट रहा था। सवालों-जवाबों के सत्र में सबसे पहले उन्हें पूछना होगा अपना सवाल। वे अपने इसी ख़्याल में थे कि तालियाँ बजने लगीं। अब क्वेश्चन-आन्सर सेशन था, सबसे पहले उन्होंने हाथ खड़ा किया तो धीरम मुस्कुराया, जानता था कि पापा ही पहला सवाल पूछेंगे। पहले तो उसे बधाई देंगे अच्छी प्रस्तुति के लिए और बाद में अपना सवाल पूछेंगे।

ऐसा कुछ नहीं हुआ सीधे दनदनाता सवाल आया – “क्या हम दिव्यांग लोगों के लिए ऐसे प्रोग्राम तैयार कर सकते हैं जिसमें एक दृष्टिहीन अपने हाथ में उस यंत्र को लेकर अपने दिमाग़ में सब देख सके, एक बधिर उसके माध्यम से सब कुछ सुन सके और एक मूक उसके द्वारा बात करके निर्देश दे सके?”

“जी हाँ पापा, हम ऐसा कर पाएँगे, असक्षम लोगों को कुछ हद तक सक्षम बना सकेंगे….।”

धीरम ने आगे भी बहुत कुछ बोला पर उन्होंने नहीं सुना। जो सुना था, वह इतनी अधिक  ख़ुशी दे रहा था कि वे खड़े होकर बच्चों की तरह ताली बजाने लगे। मानों उन बच्चों की चिन्ता का हल निकल गया जो उन्हें इन दिनों बेहद परेशान कर रहा था।

उनके साथ कई तालियाँ बजने लगीं। वे पीछे मुड़े तो देखा कि वहाँ उपस्थित सारे नौजवान खड़े होकर जोश से तालियाँ बजा रहे थे।

वे गर्व से मुस्कुराए, धीरम की ओर हाथ हिलाते हुए कुछ कह रहे थे, धीरम भीड़ की तालियों से मुस्कुराता अपने पापा को देखने लगा। उनके चेहरे पर उसकी नज़रें टिकीं तो लगा कि पापा ताली बजाते-बजाते लुढ़क-से रहे हैं। वह दौड़ कर वहाँ पहुँचा, तब तक धरा थाम चुकी थी अपने पापा को। तालियाँ अब भी बज रही थीं। उनकी थमती साँसों में मानो हर बजती ताली उनके कानों में फुसफुसा रही थी – “यहाँ एक नहीं, कई कुबेर खड़े हैं।”

**********************************

किताब अमेज़न पर उपलब्ध है।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *