रुतबा

 (कथाबिंब – अप्रैल-सितंबर 2018 में प्रकाशित)

आज पीए डे की छुट्टी है। शिक्षकों का ‘प्रोफेशनल एक्टिविटी डे’ बेचारे मम्मी-पापा का ‘घरेलू एक्टिविटी डे’ में बदल जाता है। इस अनपेक्षित छुट्टी के सारे परिणाम मम्मी को या पापा को, किसी एक को घर पर रुककर भुगतने पड़ते हैं। वैसे अभी तक तो दादा-दादी थे लेकिन अब वे भी चले गए हैं। नाना-नानी भी शहर के बाहर गए हुए हैं किसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा पूजा में सम्मिलित होने के लिए। अगर वे होते तो किसी को कोई चिन्ता ही नहीं होती। बच्चे भी नाना-नानी के लाड़-प्यार का आनंद उठाते और मम्मी-पापा भी निश्चिंत होकर अपने सारे बचे हुए काम निपटा कर ही शाम को घर लौटते। बच्चों के पापा की जरूरी मीटिंग थी, उनका रुकने का तो सवाल ही नहीं था। सो वह विकल्प भी नहीं बचा था।

सारे स्रोत जब बंद हो जाएँ तो एक ही शख़्स पर दारोमदार होता है और वह शख़्स है बच्चों की मम्मी। मम्मी को ही अपने ऑफिस में फोन करके सूचित करना पड़ा कि आज वे ऑफिस नहीं जाएँगी अपितु घर से काम करेंगी।

रोज़ तो साढ़े सात बजे से पौने आठ बजे के बीच दोनों बच्चों की पुकार लगती थी उठाने के लिए लेकिन दोनों के कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। आखिरी अलार्म के रूप में मम्मी की उल्टी गिनती बजती। दस, नौ, आठ, सात, छ: तक पहुँचते ही दोनों बिस्तर छोड़ देते। आर्मी की बटालियन की तरह खट-खट करते अपने कैप्टन को हाजिरी लगाते, मम्मी के दो, एक बोलने के पहले ही आँखें मलते-मलते दोनों, नींद में झूमते हुए किचन में पहुँच जाते।

आज दस मिनट से बच्चे बिस्तर में अलट-पलट रहे थे। कोई उठाने ही नहीं आया। घर में रोज़ जैसा हल्ला भी नहीं था। इशु को करवटें बदलते हुए याद आ गया कि आज पीए डे है, छुट्टी है।

“मनु आज छुट्टी है” इशु ने अपनी चादर फेंकी और जल्दी से पहुँची मनु को उठाने। मनु भी तो उठा हुआ ही था। उसकी खुली आँखें चमक गयीं।

अब क्या था। आज कोई दबाव नहीं था उन पर। न उठने का, न ब्रश करने का, न बाथरूम जाने का। पूरी तरह से छुट्टी के मूड में आ गए दोनों। खूब खेलना था, खूब मस्ती करनी थी। उठते ही अपने-अपने वे सारे खिलौने फैला कर बैठ गए जो स्कूल की वजह से कोने में चुपचाप पड़े रहते थे। कोई खिलौना बॉक्स के अंदर था तो कोई आधा बाहर, आधा अंदर था। कोई बिना बॉक्स के जमीन की धूल खा रहा था तो कोई एक के ऊपर एक रखा अपने दूसरे साथी के सिर का ताज बना हुआ था।

छ: साल की इशु को जो पहली नज़र में दिखा वह उसका पसंदीदा खिलौना था। एक तरफ मेगनेट लगे प्लास्टिक के अलग-अलग आकार, जो एक दूसरे से जुड़ कर कई नए आकार बना देते थे। उनमें से कुछ आकार टूट गए थे जिन्हें थोड़ी मेहनत करके जोड़ा जा सकता था। पापा ने एक दिन इशु से वादा किया था कि वे इन्हें चिपका कर ठीक कर देंगे।

जैसे ही इशु को पापा का वादा याद आया वह अपनी पूरी ताकत से चिल्लायी – “पापा आपने मेरा मेगनेट वाला खिलौना अभी तक ठीक नहीं किया। मैं कब से कह रही हूँ आपसे।”

बच्चों को आज स्कूल नहीं छोड़ना था तो पापा थोड़ी देर से उठे थे। देर में देर तो हो ही जाती है इसलिए अब भागमभाग करके तैयार हो रहे थे। नहाना था, कमीज़ पर इस्त्री भी करनी थी। इशु की बात सुनने का समय ही नहीं था।

“पापा, आप मेरी बात सुन ही नहीं रहे। मुझे यह खिलौना ठीक करना है वरना मुझे नया चाहिए।”

पापा अब टुन-टुन कर बजते फोन को उठाकर, आए हुए संदेशों की गंभीरता का आकलन कर रहे थे। यह भी देख रहे थे कि उनकी मीटिंग का समय हो रहा है जिसके लिए उन्हें जल्दी पहुँचना था।

“पापा, आप सुन नहीं रहे हैं मेरा खिलौना…मेरा खिलौना आप कब ठीक करेंगे। आप ठीक नहीं करते तो मुझे नया चाहिए।”

इस बार इशु पूरी ताकत से चिल्लायी थी। ऑफिस की चिन्ता में उलझते, तैयार होते पापा बिफर पड़े – “मेरे पास इतना समय नहीं है कि तुम्हारे छोटे-छोटे काम करता रहूँ। तुमने तोड़ा है तो तुम्हीं ठीक करो। नया तभी आएगा जब तुम इसके पैसे मुझे दो, बहुत महंगा है मैंने बहुत पैसे खर्च किए हैं।”

पापा का गुस्सा था, चिड़चिड़ाहट थी या झुंझलाहट थी, जो भी था, इशु को कुछ समझ में आया, कुछ समझ में नहीं आया। जो समझ में आया वह यह था कि इस समय पापा से कुछ कहना नहीं है, कुछ पूछना नहीं है।

खिसिया कर वह अपने से दो साल छोटे भाई मनु के साथ खेलने का उपक्रम करने लगी। इस बीच मम्मी आकर दोनों को दूध का गिलास थमा कर चली गयी थीं। दूध खत्म करके दोनों फिर से अपनी आजादी का लुत्फ़ उठाने की कोशिशों में जुट गए।   

मनन से बना मनु भी अपने मन का राजा था। छुट्टी का मतलब समझता था। स्कूल के चक्कर में अपने कई रुके हुए खेलने के मौकों को हाथ में आया देख कभी इसे उठाता, कभी उसे उठाता। एक अटकी हुई पज़ल आगे ही नहीं बढ़ रही थी, उसी की सोच में डूबा था। बीच में इशु के आने से उसकी प्लानिंग में रुकावट आ गयी पर मदद मिलने की आशा भी थी। वह इशु से पूछने लगा – “यह टुकड़ा यहाँ फिट होगा, नहीं नहीं वहाँ…” बिना रुके उससे पूछता रहा, कहता रहा –“यह, वह…।”

मनु की आवाज़ इशु से कहीं ज़्यादा तीखी थी। जितना छोटा बच्चा उतनी तीखी आवाज़। पैदा होते ही जब बच्चा रोता है तो सब लोग उसकी आवाज़ सुनने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। खुशी के मारे कभी भी यह ख़्याल किसी के मन में नहीं आता कि पल भर पहले दुनिया में आए बच्चे में इतनी ताकत से रोने की उर्जा कहाँ से आई। उस समय तो उसका रोना कराहती माँ और बाहर खड़े रिश्तेदारों के कानों में अमृत उंडेल देता है।  

पर मनु का चिल्लाना इशु के कानों में तीर की तरह चुभ रहा था। मनु की चिल्लपों को कुछ देर तो इशु सुनती रही पर कब तक सुनती, आखिर बड़ी बहन थी। सुबह से उसकी बात सुनी नहीं गयी थी, वह कैसे मनु की बात सुनती। सुबह जो दिमाग में रिकार्ड हुआ था बजने लगा – “मेरे पास इतना समय नहीं है, देखते नहीं कितना काम है मुझे। यह खिलौना ठीक करके रखना है, नहीं तो पापा को पैसे देने पड़ेंगे। तुम मुझे परेशान करोगे तो यह खिलौना ठीक नहीं हो पाएगा और अगर यह ठीक नहीं हुआ तो मैं तुमसे इसके पैसे लूँगी।”

‘बॉस’ बनने के बीज अंकुरित हो रहे थे इशु में। सुबह पापा से मिले डोज़ का आकार प्रकार थोड़ा-सा बदला था पर सारांश लगभग वही था।

“मेरे पास पैसे नहीं है, मेरे पास बस खिलौने हैं” मन्नू ने अपनी जायदाद का ब्यौरा देने की कोशिश की। 

इशु के पास वाजिब कारण थे मनु की मदद नहीं करने के। साथ ही गुंजाइश भी थी एक समझौता वार्ता की। इशु ने एक नज़र मुआयना किया मनु के खिलौनों का। कोने में पड़ा ट्रक आज तक उसने नहीं चलाया है। मनु का खास खिलौना है यह ट्रक। कोई उसे छू भी ले तो भी करंट लगता है मनु को, जोर-जोर से चीखने लगता है। अच्छा मौका है अभी। क्यों न आज ट्रक पर हाथ आजमा ही लिया जाए।

अपनी योजना को शब्द देते बोली इशु – “तो मुझे परेशान करना बंद करो, एक बार भी चिल्लाए तो तुम्हारी पज़ल कभी पूरी नहीं होगी। तुम्हारी जिम्मेदारी होगी इसके लिए। या तो तुम्हारा यह ट्रक मुझे चलाने दो या फिर अकेले करो जो करना है।”

मनु अपने आपको उस ट्रक का मालिक मानता था। कैसे दे दे। लेकिन फिर यह पज़ल तो अटकी हुई है इसका क्या करे। थोड़ी देर के लिए ही तो देना है ट्रक, फिर तो इशु इसे लौटा ही देगी। क्यों न यह देकर अपनी बिगड़ी पज़ल ठीक करवा ले।

पर नन्हे दिल का बड़ा अहं आड़े आ रहा था – ‘मेरा ट्रक है, दूँ न दूँ मेरी मर्जी। इशु भी तो अपनी चीज़ों को हाथ नहीं लगाने देती मुझे।’

मनु के लिए इशु का यह व्यवहार चोट पहुँचाने वाला था। जो ट्रक इतनी देर से अकेला कोने में रखा था उसे मनु ने कस कर पकड़ लिया। इशु ट्रक को खींचने लगी तो परेशान मनु के मन को और ज़्यादा चोट पहुँची। अब चोट लगेगी तो कहीं न कहीं दर्द तो होगा, उसे भी हुआ। उसके पास एक ही हथियार था रो-रोकर मम्मी को बुलाने का। समझौता वार्ता हो या शांति वार्ता वह गाहे-बगाहे इस हथियार का इस्तेमाल करने में माहिर था। वह रोने लगा जोर-जोर से। रोते-रोते चिड़चिड़ा कर बोलता गया, अस्फुट स्वरों में। जो उसके अलावा कोई न तो समझ पा रहा था ना ही समझने की कोशिश कर रहा था। किसी के न सुनने पर कार का एक्सीलेटर जैसे और दबता जा रहा था, रोने की गति को लगातार बढ़ाते हुए। और भी जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा मनु।

अपनी ताकत दिखाने का अवसर था यह। मम्मी को बुलाना था। जो भी दिखा उसे उठाकर फेंकने लगा। अब उस पर इशु के कुछ भी कहने का असर नहीं हो रहा था। इशु बोलती जा रही थी और मनु रोता जा रहा था। जितनी जोर से इशु बोलती उतनी ही ताकत से वह रोने लगता। यह जताते हुए कि – ‘चिल्लाती रहो मुझे कुछ नहीं सुनना।’ सुनने की शक्ति का घड़ा भर गया था। रोने की आवाज़ अब अपनी स्पीड लिमिट पार कर चुकी थी।  

आखिर मम्मी को आना ही पड़ा।

“क्यों शोर मचा रखा है तुम दोनों ने?”

दोनों ने अपनी-अपनी शिकायत मम्मी के सामने रखी। दोनों एक साथ बोल रहे थे। मम्मी को भी पता था कि इस समय दोनों को अलग करके ही समझाया जा सकता है। मनु छोटा था पहले उसी को भाव दिया –  

“मनु, चुप बिल्कुल चुप। क्या हुआ, नहीं खेलना है इशु के साथ, मत खेलो। चलो बाहर चलते हैं ताज़ी हवा में खेलने।”

मनु को ले जाते समय इशु को आँख से इशारा किया मम्मी ने तो उसे बेहद सुकून मिला। यह इस बात का सबूत था कि मम्मी झूठमूठ मनु को समझाने ले गयी हैं। अपने बड़े होने का और समझदार होने का यह एक इशारा था मम्मी की ओर से जो एक राहत की साँस दे गया इशु को।  

मम्मी हाथ पकड़ कर बाहर ले गयीं तो मनु को बहुत खास महसूस हुआ। सीना तानकर मम्मी के साथ बाहर निकल गया। आँखें मलते-मलते इशु को यह चेतावनी भी दे डाली कि – “हाथ भी मत लगाना मेरे ट्रक को।”

बाहर जाते-जाते रोने की आवाज़ निकलना बंद हो गयी थी क्योंकि इशु पीछे रह गयी थी। बाहर निकल कर देखा तो पास वाला जैनू खेल रहा था लॉन में, जो उससे एक साल छोटा था। अपना रोना भूल गया मनु और जैनू के पास दौड़ता हुआ चला गया। जैनू के घर के सामने रेत का ढेर पड़ा था। खेलने का बेहतरीन मौका था। 

अपना-अपना रेत का घर बनाने लगे मनु और जैनू।

साथ-साथ काम करते हुए रेत इकट्ठा करके अपने-अपने घर को आकार देने लगे वे दोनों। साथ रखी जैनू की पानी की बोतल से दोनों पानी लेते जा रहे थे। जैनू की कड़ी मेहनत से उसके रेत के घर की छत टिकी थी। संतुलन बनाए रखने के लिए अपने हाथ का सहारा देता जैनू मुड़कर मनु का घर देखने लगा कि ‘कहीं वह पीछे तो नहीं है’।

उसका दिल बैठ गया जब उसने देखा कि मनु का घर उसके घर से कहीं बेहतर और बड़ा आकार ले रहा था। अपने घर को निरीह निगाहों से देखते हुए उसने फिर से मुड़कर मनु का घर देखा। अपने घर को वैसा ही आकार देना चाहता था वह। इस देखने और पलटने के चक्कर में जैनू का हाथ जोर से हिला, टक्कर लगी और उसके घर का एक हिस्सा तहस-नहस हो गया।

रही सही हिम्मत टूट गयी जैनू की।

बेबसी में चिल्लाया – “यह टूट गया है मनु, मदद करो।”

इतनी देर से की गई कड़ी मेहनत बेकार चली गयी थी। मनु ने पलट कर देखा तक नहीं। अपनी असफल कोशिश पर जैनू को गुस्सा आया। आँसुओं को तो आना ही था – “मनु…मनु यह टूट गया।”

मनु का ध्यान खींचने के लिए चिल्लाना जरूरी था – “मनु मेरा घर….” जैनू की चीखती आवाज़ मनु के कानों में लगातार हमले कर रही थी। उसे अपना काम पूरा करना था। एक नज़र पलट कर देखा जैनू का घर तो पूरा टूट गया था। उतनी ही तेज़ आवाज़ में बोला मनु – “तुमने तोड़ा है तुम ठीक करो।”

अब जैनू जोर से रोने लगा – “मेरा घर, मनु इसे ठीक करवा दो न”

मनु बगैर उसे देखे बोलता गया – “देखते नहीं मुझे कितना काम है। अगर तुम्हारा ठीक करूँगा तो मेरा घर बनेगा ही नहीं।” मनु के अवचेतन मन ने जो सुना था, जैसे सुना था, जितना सुना था उतना कट-पीट कर बाहर आ गया।  

जैनू बेबस होकर मनु के चेहरे को देखता रहा। मनु को थोड़ी दया आ गयी। ध्यान से देखा जैनू को, जिसके कपड़े रेत से पूरी तरह सन गए थे। कहीं बालों में रेत थी तो कहीं हाथों में तो कहीं कपड़ों पर। उसकी कमीज़ की जेब में पड़े लॉलीपॉप की डंडी भी दिख गयी मनु को। अच्छी तरह मालूम था उसे कि जैनू के घर ऐसे लॉलीपॉप बहुत सारे हैं। सौदेबाजी करने का अच्छा मौका था –

“चलो, मैं तुम्हारा घर ठीक कर सकता हूँ…”

“सच” जैनू के चेहरे पर चमक आ गयी – “कर दो न” इस समय एक असहाय विवशता ओढ़े उसका चेहरा मदद की गुहार लगा रहा था।

“मैं तुम्हारा घर ठीक कर दूँगा। मैं बहुत तेजी से घर बनाता हूँ” अपनी तारीफ़ के पुल बाँध कर सामने वाले को मजबूर करने की कला थी यह।

“हाँ तुम बहुत तेज हो” हथियार डाल दिए जैनू ने।

“मैं तुम्हारा घर ठीक कर दूँगा, तुम मुझे अपना लॉलीपॉप दे दो” मनु की आँखों में इस समय किसी सौदागर की चतुराई भरी पड़ी थी। साथ ही परखने की कला कि उसके प्रस्ताव का क्या असर हो रहा है सामने वाली पार्टी पर।  

बेचारा जैनू, पल भर के लिए उसने सोचा। उसकी मम्मी ने पूरे दिन का कोटा दे दिया था। यह कहते हुए कि – “आज पूरे दिन और कोई लॉलीपॉप नहीं मिलेगा, समझे।”

अब और तो मम्मी से मांग नहीं सकेगा। अगर यह मनु को दे दिया तो वह क्या खाएगा। उसने इसे बचाकर रखा था ताकि खेलकर फिर आराम से खा सके। पर अब क्या करे। अनायास ही उसके हाथ लॉलीपॉप के स्पर्श को मचलने लगे।  

उसे सोचते देख मनु ने अपना मुँह फेर लिया। अच्छी तरह जानता था वह कि यहाँ उसका राज चलता है। गरज होगी तो आएगा जैनू लॉलीपॉप लेकर। इधर जैनू की दिमागी दौड़ पास वाले दरवाजे तक जाती और लौट आती। मनु ही तो है जो उसके साथ खेलता है। उसका अच्छा दोस्त है। छुटकी तो दिन भर पालने में सोयी रहती है। एक दोस्त की छोटी-सी मांग पूरी करने में कोई हर्ज नहीं। वैसे भी मम्मी से दोबारा मांग लेगा यह कह कर कि वह लॉलीपॉप मनु को दे दिया था। झूठ तो बोल नहीं रहा वह। मम्मी चाहे तो पूछ लें मनु से। एक लॉलीपॉप की रिश्वत देकर अपना काम निकलवाना वाजिब लगा उसे।

“लो यह लॉलीपॉप, अब मेरा घर ठीक कर दो।”

अपने बड़े होने का रौब जताते हुए मनु ने लॉलीपॉप का रेपर खोला और बिना रुके सीधे अपने मुँह में डाल लिया। डंडी को बाहर रखे मिठास का आनंद लेते हुए वह जैनू का घर सँवारने में लग गया। एक कुशल सौदागर की तरह खुशी-खुशी उसकी मदद करते मनु का चेहरा दमक रहा था और मदद पाते जैनू का चेहरा भी चमक रहा था। मनु के चेहरे पर अपनी जीती हुई दौलत की खुशी थी। अपने भीतर की चोट को हस्तांतरित कर दिया था उसने और एक जिम्मेदार पड़ोसी की ड्यूटी बजा दी थी। जैनू खुश तो था मनु की मदद से पर अपने लॉलीपॉप के जाने का दु:ख भी था। वह लॉलीपॉप जिसे अब मनु चूस-चूस कर खा रहा था।  

मनु वाला रुतबा कहीं तो उसके अंदर जगह बनाएगा या वह भी कभी न कभी उसे इस्तेमाल करेगा इतना सोचने के लिए वह काफी छोटा था। नहले पर दहला क्या होता है पता नहीं था। इतनी तो समझ अभी थी नहीं पर फिर भी न जाने क्यों उसकी नज़रें अपनी छोटी बहन को ढूँढ रही थीं जो इस समय दोपहर की झपकी ले रही थी।

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